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ग्लानि [यात्रा संस्मरण]- रचना सागर


बात कुछ वर्षों पहले की है , जब जन-जीवन सामान्य चल रहा था। उस समय सभी अपनी अपनी दिनचर्या में व्यस्त और मस्त थे । आज लोगों का विश्वास अच्छाई और भलाई पर से उठता सा जा रहा है। मेरी यह यात्रा वृतांत आज के जमाने में भी छिपी अच्छाई और इंसानियत से है।
यह वाक्या कुछ उस समय का है जब बस सड़को पर दौड़ लगाती थी और बस की दो सीटो पर चार- पांच यात्री यात्रा करते नजर आते थे। मुझे मेरी बच्चों के साथ अचानक ही घर जाने का कार्यक्रम बन गया। ट्रेन की टिकट तो हमने तत्काल बुक करा ली पर बस की टिकट की कुछ व्यवस्था नहीं हो पाई। दूसरा इत्तेफाक यह हुआ कि यह यात्रा हमें अकेले करनी थी मतलब पतिदेव इस यात्रा में शामिल ना हो पाए। फिर क्या था एक परिचित सज्जन (जो हमारे जाने वाले थे) उन्हें हमें ट्रेन तक चढ़ाने की जिम्मेदारी दी गई यह यात्रा हमें डलहौजी से पठानकोट तक बस में करनी थी,जहां वैसे भी गिनी चुनी बसे ही चलती है। सामान के नाम पर मेरे साथ एक बड़ा सा ट्रॉली बैग और एक पर्स था। चूँकि बस यात्रा के दौरान हमारी टिकट कंफर्म नहीं हो पाई थी तो जैसे तैसे हमें बस तो मिल गई पर बस में सीटें पहले से बुक होने के कारण हमारे सीट की व्यवस्था नहीं हो पाई । जैसे -तैसे ,लपकते- लटकते हम बस में यात्रा कर ही रहे थे कि अचानक उस सज्जन पुरुष (जो हमें ट्रेन तक छोड़ने वाले थे) हमें एक सीट की ओर इशारा करते हुए कहा यहां ,"आप बच्चों के साथ बैठ जाओ। " मैंने जैसे-तैसे उस सीट पर बच्चों के साथ बैठते ...इशारा किया कि आप कहां बैठेंगे उन्होंने मेरी ट्रॉली बैग की ओर इशारा करते हुए कहा ... मैं इस पर बैठ जाऊंगा। मैंने भी सहमति से सिर हिला दिया। चूंकि डलहौजी से पठानकोट का सफर करीब तीन से चार घंटे का होता है और रास्ते भी बहुत अच्छी हालत में नहीं है, टॉली बैग मेरा बड़ा था रास्ता लम्बा ,.... ये सोच कर मै उनको बैग पर बैठने से मना न कर पाई और इंसानियत दिखाई ।
इस घटना में मोड़ तब आता है जब एक , दूसरा व्यक्ति जिसे मैं जानती भी न थी वो मेरे टॉली बैग पर आकर चुपचाप बैठ जाता है । मैं अपने साथ के सज्जन पुरुष की ओर इशारा करती हूँ.... कि ये क्यूं मेरे बैग पर बैठ रहा है , उन्होंने इशारे में कहा जाने दो... बैठने दो।
उनके इतना कहते ही मेरी आवाज़ निकल पड़ी.... भईया ये मेरी ट्रॉली बैग है , आप इस पर से उठ जाओ । वो मुझे अनुसुना कर वैसे ही बैठा रहा .... मै फिर से कहती हूँ .... भइया आप इस ट्रॉली बैग पर से उठ जाओ .... वो फिर भी उसी बैग पर थोड़ा हल्का होकर बैठ जाता है I मै फिर उस सज्जन पुरुष को कहती हूँ ट्रॉली टूट जाएंगी। आप दो व्यक्ति इस पर बैठे हो उसकी ओर से कोई प्रहिक्रिया नही होती है ...... मै वापस अनजान व्यक्ति से कहती हूँ... भइया मुझे आगे का सफर अकेले करना है यह ट्रॉली बैग मेरा टूट जाएगा मैं आगे कैसे इसको लेकर जाऊंगी ( एक लंबे स्वर में मैंने उसे कहा ) आप मेरे ट्रॉली बैग पर से उठ जाओ ,आप कहीं और जाकर बैठो I मेरे ट्रॉली बैग पर बैठ कर उसे तोड़ ही दोगे .......। मेरा इतना कहना था कि वह व्यक्ति ना जाने कहां चला गया मैंने सकून की सांस ली और अपनी यात्रा उस एक ही सीट पर बच्चों के साथ पूरी की I बस से उतरने के पश्चात मैंने बड़ी उत्सुकता से उस सज्जन पुरुष से पूछा वह अजनबी व्यक्ति कौन था ...जो जबरदस्ती मेरे ट्रॉली बैग पर बैठ गया था, मेरा तो ट्रॉली बैग ही टूट जाना था । अच्छा हुआ वह चला गया .... वो कहां चला गया? .... फिर नजर नहीं आया ...।
सज्जन पुरुष ने ठंडी सांस भरते हुए मुझे बताया कि तुम जिस सीट पर बैठी थी ... वह सीट उसी व्यक्ति (अजनबी )की थी | इतना सुनना था कि मेरा मन ग्लानि से भर गया । मैने कहां" तो फिर आपने पहले क्यों नहीं बताया। " उन्होंने कहा "मुझे ऐसे रास्ते में चक्कर बहुत आते है जिस वजह से मैं चुप था I" ये थी एक इंसानियत की मिसाल | उस यात्रा के बाद मेरे मन मे उस व्यक्ति के लिए क्षमा और धन्यवाद का बोध रह गया....... । मै आप या कोई कुछ छोटा भी अच्छा काम करते है तो हमे लाइक और कमेन्ट ,शाबसी , मेडल का इंतजार होता है पर कुछ अनजाने से फरिश्ते मौके पर अपनी अच्छाई दिखाकर ना जाने कहां चले जाते हैं और इस तरह यह वाक्या में दिलो जहन में बस गया... जो मैं आप सभी के साथ सांझा कर रही हूं ताकि आज उम्मीद छोड़ते लोग यह जान सके कि अच्छाई अब भी जिंदा है.... जहां लोगो मे स्वार्थ है वहाँ परमार्थ भी है।

एक माँ की सच्चाई ...[बाल कविता]: रचना सागर





माँ  एक ऐसा शब्द जो अपने  आप में सम्पूर्ण  है । पर जाने अनजाने हम उसकी गरिमा को ठेस पहुंचा देते हैं । उसका दिल दुखा देते हैं । पर फिर भी वो अपने बच्चों के लिए अच्छा ही चाहती है। ऐसा सिर्फ एक माँ ही करती है माँ .."एक माँ की सच्चाई ... " 

एक माँ की सच्चाई ...[बाल कविता]: रचना सागर 


मैंने देखा है 
माँ को प्‍यार से मुझे सहलाते हुए
दुनिया से मुझ को छुपाते हुए
उदास होकर भी 
मेरे लिए मुस्कुराते हुए
मैंने देखा है
माँ को स्वयं पर गुस्सा करते हुए
अनकही सी 
आँखों से सब कुछ कहते हुए
न चाहकर भी डांट लगाते हुए
दुनिया के पहलू समझाते हुए
मैंने देखा है
माँ को खुद का श्रृंगार करते हुए
मेरी खुशी में खुश
मेरे गम में आँसू बहाते हुए
मैं समझ न पाई ... .
न पहचान पाई :
उस माँ की कहानी 
 माँ की जुबानी
जब आज मैं  स्वयं माँ  बनी
समझ पाई जान पाई 
माँ के पहलू को पर..
मैं आज भी जुबा से बयान
न कर पाई ... .
एक माँ की सच्चाई...


आजादी का पैमाना [कविता]: रचना सागर

 


जब बात एक औरत की पाबंदी और उसे आजादी देने की आती है तो घूमना, खाना ,उठना, बैठना, पढ़ना ये सब उसकी आजादी के पैमाने गिनाए जाते हैं । इसी संदर्भ में पेश है मेरी नई कविता ...

आजादी का पैमाना [कविता]: रचना सागर 



मैं चिड़िया होकर भी
पंख फड़फड़ाने से
कतराती रही
यहां तो अंडे भी चोच
मार जाते रहे
जो चुपचाप सुनती रहूं
संस्कारी कहीं जाऊँ
जो दिल का कह दूं
Attitude वाली नज़र आने लगूँ
बात तब भी वही थी
बात अब भी वही है
बस फर्क यह आ गया
दिन को दिन और रात को रात
कह दिया
खामोश थी
पर जुबान तो तब भी थी
सही - गलत पर चुप रही
पर पहचान तो तब भी थी
मैं चिड़िया होकर भी
पंख फड़फड़ाने से
कतराती रही
यहां तो अंडे भी चोच
मार जाते रहे....



एक खामोशी भरा रिश्ता [कविता]: रचना सागर

 




आज के इस समय में हर इंसान से हमारा कोई ना कोई रिश्ता जुड़  ही जाता है कुछ  मीठे अनुभव दे जाते हैं तो कुछ कड़वी  सीख...इसी संदर्भ में पेश है मेरी नई कविता ...

एक खामोशी भरा रिश्ता [कविता]: रचना सागर 



रिश्ता है हमारे  बीच दर्द का
जहाँ फुर्सत नहीं एक पल गँवाने का
मैंने हर पल तुम्हें जिया है
जिंदा रखा है अपने एहसासों में
अपनी हर सांसों में
तू खामोश रहता था
मुझसे दूर रहता था
मैं महसूस करती थी
मेरी तन्हाई को, तेरी सादगी को
तू जाने को चला गया
एक रिश्ता जोड़ गया
दर्द मैंने दिए थे तुझे
उस दर्द को मेरे लिए छोड़ गया
हर दर्द को पी जाऊँगी
हर ज़ख्म को सह जाऊंगी
तू खुश रहे हमेशा
यही कामना कर जाऊँगीी



चंद्रशेखर बनूंगा मैं [बाल कविता]: रचना सागर



मेरे बेटे की मांग पर यह कविता उस वीर के नाम जिन्होंने आजादी की लड़ाई में अपना महत्वपूर्ण योगदान देते हुए अंग्रेजों में एक ख़ौफ़ पैदा कर आजादी की लड़ाई में एक जान फूंक दी। .... पेश है मेरी नई कविता "चंद्रशेखर बनूंगा मैं " 

चंद्रशेखर बनूंगा मैं [बाल कविता]: रचना सागर 


माँ मुझ को गुलेल दिला दो
चंद्रशेखर बनूंगा मैं।

सत्य राह पर चलूंगा मैं
सबसे आगे रहूँगा मैं।

हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई
यह अपने है भाई- भाई ।
माँ मुझ को गुलेल दिला दो
चंद्रशेखर बनूंगा मैं।

भगत सिंह ,सुखदेव, राजगुरु
यह थे कल के आजाद सिपाही।

आज का सैनिक बनूंगा मैं
भारत माँ की सेवा करुंगा मैं ।

माँ मुझ को गुलेल दिला दो
चंद्रशेखर बनूंगा मैं।


मेरे सपनों का भारत [बाल कविता]: रचना सागर


आज हमारे लिए बड़े सौभाग्य की बात है की हमें हर साल 26 जनवरी को गणतन्त्र  दिवस मनाने का मौका मिलता है| हर साल की तरह इस साल भी सभी को इस दिवस की बहुत बहुत शुभकामनाए व इस दिवस पर पेश है मेरे नई बाल कविता "मेरे सपनों का भारत

  

मेरे सपनों का भारत [बाल कविता]: रचना सागर 


मेरे भारत में ना कोई भुखमरी से मरे
हर जवान काम मेहनत से करें

ना किसी हिंदुस्तानी का मन बिके
यहाँ सभी अच्छे गुण ही सीखेँ

यहां पर ना हो भ्रष्टाचार का नामोनिशान
प्रगति का पथ सीखें.... यहां पर हर इंसान

हर सैनिक करें दुश्मनों को लहूलुहानन
न करें अपनी जान कुर्बान

गरीबी व अशिक्षा से मिलें इसे छुटकारा
चमके हर बालक बन एक सितारा

यहाँ कभी ना बैठे कोई युवक बेकार
यहाँ पर हो नौकरियों की भरमार

मेरा भारत बन जाए पृथ्वी का गहना
इसकी उन्नति का क्या कहना

बढ़ती रहेंगी इस तिरंगे की शान
सारे जग से प्यारा मेरा हिंदुस्तान


पर्यावरण बचाती मैना [बाल कविता]: रचना सागर





हमारे घर आंगन मे...हमारे रोजमर्रा के जीवन में पर्यावरण को बचाने मे सबसे बड़ा  योगदान इन  चिड़ियों का है ..इनके बिना हमारा जीवन परिवेश अधूरा है ..... पेश है मेरी नई कविता "मैंना " 

पर्यावरण बचाती मैना [बाल कविता]: रचना सागर 


रोज सवेरे आती मैना, 
मेरे मन को भाती मैना, 
बचा खुचा भोजन खाकर, 
पर्यावरण बचाती मैना।

देखो तो कितनी सुंदर है, 
भूरा पीला अनमोल रंग है, 
शान से गर्दन ऊपर करती, 
फिर मटक- मटक के चलती मैना ।

खुशी का राग सुनाती मैना, 
रोज सवेरे आती मैना,
मेरे मन को भाती मैना ।

जिस घर आंगन बसती मैना, 
प्यार की खुशबू फैलाती मैना ।
डाल डाल फिरती है मैना, 
सबके चेहरे पर मुस्कान भरती मैना ।

रोज सवेरे आती मैना, 
मेरे मन को भाती मैना ।
वातावरण खुशहाल बनाएं हम भी, 
मैना जैसे बन, सब के मन को भाए हम भी ।
पर्यावरण बचाएं हम भी ।

खिचड़ी [बाल कविता]: रचना सागर



उत्तरी भारत के हिंदु साल की शुरूआत का पहला त्योहार है.... इस पर्व को बड़े बूढ़ो के आशीर्वाद के साथ शुरूआत करते  है..... इसे उत्तरी भारत मे मकर संक्रांती व बिहार उत्तर प्रदेश आदि मे खिचड़ी के नाम से जानते है ..... पेश है मेरी नई कविता "खिचड़ी " 

खिचड़ी [बाल कविता]: रचना सागर 


मकर संक्रांति से
नववर्ष की शुरुआत करते हैं
संग दही चूड़ा का
स्वाद चखते है
उस पर खिचड़ी के साथ
देसी घी का स्वाद खूब भाता है
बचपन के खाने की
याद दिलाता है
पतंग की रंगबिरंगी
जी को ललचाती है
फिर बच्चा बन पेंच लड़ाने को
उकसाती है
गुड़ सी मिठास
हर रिश्ते मे घोलती संक्रांती
दान-पुण्य और सत्कर्म का
पाठ सिखाती है मकर संक्रांती
साझा करके सब खाओ पियो
संग मिलकर मजे किया करो
खिचड़ी के नाम से भी
जानते है मकर संक्रांति ।

बेवजह का बवाल [यात्रा संस्मरण]- रचना सागर


मैंने कई बार रेलगाड़ी की यात्रा की है, आशा है, आप सब ने भी कभी ना कभी रेलगाड़ी में यात्रा की होगी| वह स्टेशन की चहल-पहल…… वो रेल की आवाज….. इन सब के बीच.. एक चीज है जो होती तो स्थिर है पर ... हमारी नज़र एक बार तो उस पर जाता ही है.... हां वह है ट्रेन के कोने मे लटकी वह चेन जो शांति से वही होती है... पर उसे देखकर एक जिज्ञासा होती है कि क्या यह चेन...इस भारी भरकम रेलगाड़ी को रोक सकता है....| क्या हो... अगर मैं इस चेन को एक बार खींच कर देखती.... जी हां बच्चे ही नहीं बल्कि बड़ों को भी यह काफी कैसेट उत्कंठित लगती है...| सभी की तरह मेरे मन में भी यह विचार आते थे पर उस रेल यात्रा के बाद यह उलझन... यह उत्सुकता सब समाप्त हो गई...|

गर्मियों के दिन थे, मैं छूटियाँ मनाने अपने परिवार के साथ उज्जैन गई थी| बड़ा मजा आया था । पर हम सब जब वहां से लौट रहे थे, रेल गाड़ी में बैठे ... ट्रेन खुलने मे अभी वक्त था और गर्मी भी बहुत थी। हमारे पास पानी ख़त्म हो चला था ... तो मेरे पति पानी भरने के लिए नीचे उतरे ....साथ में मेरा बेटा भी हो चला| मै और मेरी बेटी आराम से बैठकर पानी का इंतजार कर ही रहे थे कि अचानक रेलगाड़ी की सीटी की आवाज़ सुनाई दी और हमने सोचा किसी और रेलगाड़ी की सीटी की आवाज है..... पल भर में ही हमारी ट्रेन चलने लगी| हम घबरा गए मै भागकर गेट पर गई और बेटे को आवाज देने लगी .....उस भागम भाग में ..मेरी बेटी उसी कोच में चुपचाप खड़ी थी ...उसे समझ नहीं आ रहा था कि क्या करना चाहिए उस वक्त किसी ने पीछे से आवाज दी ...." अरे कोई चेन पुलिंग कर दो "..... मेरी बेटी ने कुछ सोचे बिना चेन खींची.... रेलगाड़ी एका- एक रुक गई ....| मै तुरंत नीचे उतरी और चारों और अपने पति और बेटे को आवाज़ देने लगी| क्षण भर भी नहीं बीते थे कि वहां तीन-चार पुलिस वाले आ गए और चैन पुलिंग किसने की पुछने गया ...........? मैंने धीमे स्वर मे जवाब दिया " चेन पुलिंग मैंने किया है ".... गुस्से मे वे चेन पुलिंग का कारण पुछने लगे ? ....मै उन्हें बताने लगी कि मेरा बेटा स्टेशन पर ही छूट गया ...... तभी मेरे पति और बेटे आ गए जो की किसी और बौगी मे चढ़ गए थे और पूछने लगे कि क्या हुआ? पुलिस वाले ने गुस्से से कहा..." अरे जब पापा बच्चे के साथ थे.. तो आखिर चेन पुल करने की क्या जरूरत पड़ गई। " ऐसे करके वह मुझे डराने लगे कि....अब तो पुलिस स्टेशन में केस होगा ...., आपको यह ट्रेन छोड़कर थाने चलना होगा आदि.....कह कर डराने लगे ........... । यह सब देख शीट पर बैठी मेरी बेटी चुपचाप सोच रही थी..... उसे पता ही नहीं चल रहा था कि आगे क्या होगा..... ..... क्या माँ और पापा को पुलिस पकड़ कर ले जाएगी ?... यह बहस कोई 5- 10 मिनट हुई होगी , मेरे पति ने कहा हम फाइंड देने के लिए तैयार तो हैं पर वह पुलिस वाला तो सुन ही नहीं रहा था । बेवजह की बवाल को बढ़ता देख कर । अंत में मेरे पति ने ₹2000 का फाईन विनती करते हुए दिया और सब ठीक हो गया। पर रात में, मैं उसी बारे में सोचती रही उस रात को ऊपर सीट पर सोने पहुंची तो अपनी पुरानी आदत की तरह पास में लगे उस चेन पुलिग वाले बोर्ड को देखने और पढ़ने लगी| वैसे तो उसको मैं अपनी हर रेल यात्रा में पढ़ती थी....पर उस दिन लगा कि मैंने उसे कभी पढ़ा ही नहीं था | साफ-साफ अक्षरों में लिखा था " चेन पुलिंग का जुर्माना ₹2000"| हम सब जानते थे पर फिर भी पुलिस वाले हमें डरा रहे थे और हम उसके सामने गिड़गिड़ा रहे थे| उस वक्त लगा मानो हम पढ़े लिखे अनपढ़ थे । उस दिन के बाद ना मैंने उस बोर्ड को फिर पढ़ा और ना ही उस यात्रा को कभी भूल पाई और मैंने सोचा कि यह घटना मै आप सभी के साथ साझा करूँ । 

इस प्रकार मैं अपनी अंकल लगाए बगैर पुलिस वालों के सामने रिक्वेस्ट करके ₹2000 दिए । 

समस्या में भी घबराना नहीं चाहिए और अपनी सूझबूझ से काम लेनी चाहिए । 


बताओ जरा …. तो जाने [बचपन से ]- रचना सागर




1.सफेद मुर्गी हरी पूंछ,
तुझे ना आए तो लाले से पूछ ।


2.छोटा-मोटा राजकुमार
कपड़ा पहने एक हजार।


3.पगड़ी में भी गगरी में भी
और तुम्हारी नगरी में भी
कच्चा खाओ तो पक्का खाओ
शीश मे मेरा तेल लगाओ।


4.मैं हरी मेरे बच्चे काले
मुझको छोड़ मेरे बच्चों को खा ले ।


5.एक नाम जानकी का है
एक नाम नतीजा
एक फल ऐसा है
जिसको खाए चाचा भतीजा ।

6.वह कौन- सा ' कान' है जिसमें मनुष्य रहता है?

7.वह कौन- सा 'यार' है जो सबको नुकसान पहुंचाता है ?


8.पानी जैसा मेरा रूप
सुखा ना पाए मुझको धूप ।



जवाब हाजिर है ........
.
.
1.मूली, 2.प्याज, 3. नारियल, 4. इलायची, 5. सीताफल, 6. मकान, 7. हथियार, 8. पसीना .
.
.



आया है क्रिसमस, हम सब मनाएं क्रिसम [बाल कविता]- रचना सागर



रचनाकार परिचय:-

रचना सागर का जन्म 25 दिसम्बर 1982 को बिहार के छ्परा नामक छोटे से कस्बे के एक छोटे से व्यवसायिक परिवार मे हुआ। इनकी शिक्षा-दीक्षा भी वहीं हुई। आरंभ से ही इन्हे साहित्य मे रूचि थी। आप अंतर्जाल पर विशेष रूप से बाल साहित्य सृजन में सक्रिय हैं।
आया है क्रिसमस, हम सब मनाएं क्रिसम [बाल कविता]- रचना सागर


आया है क्रिसमस, हम सब मनाएं क्रिसमस
Sing we “merry Christmas….. merry Christmas….”
भगवान से प्रार्थना करें
वे सब अच्छा करे
इस अंधकार को दूर कर
रौशन जहाँ करें।
Sing we “merry Christmas….. merry Christmas….”

विश्वास का candle जगमगाएं
Peace का cake बना बांटें
मस्ती में सब मिलकर नाचें
बुरा वक्त पल भर में भागे
आया है क्रिसमस, हम सब मनाए क्रिसमस
Sing we “merry Christmas….. merry Christmas….”

सब मानव एक समान हो
कहीं न भेद भाव हो
अज्ञानता दूर हो ज्ञान का प्रकाश हो
इस क्रिसमस सैंटा खुशिओं का उपहार दो
सैंटा आते है खुशिया लाते है
Colourful gifts हमें दे जाते हैi
I hope नये साल में smile आये
बच्चे बाहर आकर खुशियाँ मनाएं
नये साल से पहले सैंटा सारी problem ले जाए
आया है क्रिसमस, हम सब.......



क्या औरत कभी कामयाब हो पाती है...? [कविता]- रचना सागर





रचनाकार परिचय:-

रचना सागर का जन्म 25 दिसम्बर 1982 को बिहार के छ्परा नामक छोटे से कस्बे के एक छोटे से व्यवसायिक परिवार मे हुआ। इनकी शिक्षा-दीक्षा भी वहीं हुई। आरंभ से ही इन्हे साहित्य मे रूचि थी। आप अंतर्जाल पर विशेष रूप से बाल साहित्य सृजन में सक्रिय हैं।
क्या औरत कभी कामयाब हो पाती है...? [कविता]- रचना सागर


जब भी कामयाबी की ओर वो कदम बढ़ाती है
कभी बर्तन ..... कभी बच्चे तो
कभी छुरी, चाकू से वो टकराती है
मंजिल को देखने से पहले वो
बच्चों के सपनों पर नजर दौड़ाती है
भले की वो सपने उसके नहीं हैं
फिर भी वो पूरा ज़ोर लगाती है

जब भी कामयाबी की ओर वो कदम बढ़ाती है
कभी बच्चो की, तो कभी घर की सुरक्षा से वो टकराती है
जरूरतों की लिस्ट को वह फ्रिज पर टंगी पाती है
लौंड्री बास्केट घर के कोने से उसे बुलाती है
प्रेस की तार से वो खुद को ज़ुदा नहीं कर पाती है

जब भी कामयाबी की ओर वो कदम बढ़ाती है
दो पैसों के लिए वो खुद को मोहताज पाती है
बजत की गुल्लक से वो नजरें चुराती है
इच्छाओ के पंख को वो खोल नहीं पाती है
जो बच्चों के रोज़ नाज-नख़रे उठाती है
आज वो job पा भी जाती है
तो समाज उसपर ऊंगली उठाती है

लाख मशक्कतों के बावजूद.....
जब भी कामयाबी की ओर वो कदम बढ़ाती है
तो भी क्या औरत कभी कामयाब हो पाती है ...????


संवेदना [कविता]- रचना सागर





रचनाकार परिचय:-

रचना सागर का जन्म 25 दिसम्बर 1982 को बिहार के छ्परा नामक छोटे से कस्बे के एक छोटे से व्यवसायिक परिवार मे हुआ। इनकी शिक्षा-दीक्षा भी वहीं हुई। आरंभ से ही इन्हे साहित्य मे रूचि थी। आप अंतर्जाल पर विशेष रूप से बाल साहित्य सृजन में सक्रिय हैं।
आज हम इंसान अपने जीवन के भागम भाग में इतने व्यस्त हो गए हैं कि अपनी अंतरात्मा की आवाज को ही नहीं सुन पाते हैं ।
संवेदना [कविता]- रचना सागर


आज की इस भागमभाग में
दुनिया के समंदर में
वेदनाओं के भंवर में
संवेदनाओं के लिए वक्त कहां
आज संवेदना उठती है मन में
बसती है दिल में
और दिमाग में सिमट जाती है
जिस तेजी से हम बढ़ रहे हैं
खुद ही खुद को छल रहे हैं
एक दिन ऐसा भी आएगा जब
हमसे पूछा जाएगा
कि बताओ संवेदना कौन है
किसी की बहन है, बीवी है
नानी है, सहेली है
यह कैसी पहेली है?
आखिर कौन है संवेदना?
रिश्ता क्या है इससे मेरा
तब हम ना बता पाएंगे
कि संवेदना दिल की आवाज है
इंसान की इंसानियत है
जानवर और हमारे बीच का फर्क है
मां की ममता और बाप के दिल का प्यार है
छूने से छू लेने का एहसास है संवेदना
और कलम हाथ में ले कर
यह साधिकार कथन है कि
संवेदना पहचान है साहित्य की भी
इसलिए संवेदित हूं
कि खो ना जाए कहीं
यह भावनाएं ..........
यह संवेदनाएं ..........