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आजादी का पैमाना [कविता]: रचना सागर

 


जब बात एक औरत की पाबंदी और उसे आजादी देने की आती है तो घूमना, खाना ,उठना, बैठना, पढ़ना ये सब उसकी आजादी के पैमाने गिनाए जाते हैं । इसी संदर्भ में पेश है मेरी नई कविता ...

आजादी का पैमाना [कविता]: रचना सागर 



मैं चिड़िया होकर भी
पंख फड़फड़ाने से
कतराती रही
यहां तो अंडे भी चोच
मार जाते रहे
जो चुपचाप सुनती रहूं
संस्कारी कहीं जाऊँ
जो दिल का कह दूं
Attitude वाली नज़र आने लगूँ
बात तब भी वही थी
बात अब भी वही है
बस फर्क यह आ गया
दिन को दिन और रात को रात
कह दिया
खामोश थी
पर जुबान तो तब भी थी
सही - गलत पर चुप रही
पर पहचान तो तब भी थी
मैं चिड़िया होकर भी
पंख फड़फड़ाने से
कतराती रही
यहां तो अंडे भी चोच
मार जाते रहे....



एक खामोशी भरा रिश्ता [कविता]: रचना सागर

 




आज के इस समय में हर इंसान से हमारा कोई ना कोई रिश्ता जुड़  ही जाता है कुछ  मीठे अनुभव दे जाते हैं तो कुछ कड़वी  सीख...इसी संदर्भ में पेश है मेरी नई कविता ...

एक खामोशी भरा रिश्ता [कविता]: रचना सागर 



रिश्ता है हमारे  बीच दर्द का
जहाँ फुर्सत नहीं एक पल गँवाने का
मैंने हर पल तुम्हें जिया है
जिंदा रखा है अपने एहसासों में
अपनी हर सांसों में
तू खामोश रहता था
मुझसे दूर रहता था
मैं महसूस करती थी
मेरी तन्हाई को, तेरी सादगी को
तू जाने को चला गया
एक रिश्ता जोड़ गया
दर्द मैंने दिए थे तुझे
उस दर्द को मेरे लिए छोड़ गया
हर दर्द को पी जाऊँगी
हर ज़ख्म को सह जाऊंगी
तू खुश रहे हमेशा
यही कामना कर जाऊँगीी