इन्सान हो इंसान तुम[कविता]- रचना सागर


उसको क्या पता था

इंसान उसे भूल जाएगा

गुनाहों में पड़ के वो

क्या कर जायेगा

खाली हाथ आया था वो

गुनाहों संग जायेगा

लिया-दिया- सब किया

यही रह जाएगा

उसको क्या पता था...

हिंसा बस हिंसा है

तेरे और मेरे मन में

प्यार कहाँ है?

ढूढ़ो तो ढूढ़ो/जानो तुम

उसको क्या पता था...

मारो और काटो तुम

यही कर पाए हो

इंसान हो इंसान तुम

नहीं बन पाए हो

उसको क्या पता था...

नफरत है तेरे अन्दर नफरत फैलाएं हो

मज़हब के नाम पर घर लूट खांए हो

सोचो तो जरा सोचो तुम

क्या मुहम्मद बन पाएं हो?

उसके ही नाम पर लूट मचाए हो

इन्सान हो इंसान तुम नहीं बन पाए हो?

रचना सागर

29.06.2010

5:30 PM

23 comments:

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

अच्छी अभिव्यक्ति ....राम भी कहाँ बन पाए हैं ?

Good Do said...

Very nice poem, Well Done! After democracy also, we have not yet become an ideal human being

Mrs. Sushma Kapoor said...

Insaan yadi insaan ban pata to kya baat thi, yeh sab kutch dekhne ko nahi milta

Anonymous said...

"इन्सान हो इंसान तुम नहीं बन पाए हो"

सच्ची सोच को दर्शाती अच्छी प्रस्तुति - मनमोहक ब्लॉग.

Patali-The-Village said...

आप की कविता बहुत अच्छी है| मेरे ब्लॉग पर आने का आभार|

अजय कुमार said...

सार्थक सोच ,अच्छी रचना ।

indu bidani said...

Very nice poem, Well Done! After democracy also, we have not yet become an ideal human being.
Congrats to Rachna Sagar & Abhishek Sagar.
Bye
Indu

अजय कुमार said...

I appreciate your writing skill. Keep it up .

दिव्यांशु भारद्वाज said...

लोग भगवान, संत,बाबा क्या-क्या बने फिरते हैं, अगर पहले सच्चे इंसान ही बन जाएं तो दुनिया से दुख दूर हो जाएंगे।
बहुत सुंदर अभिव्यक्ति

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार said...

प्रिय बंधुवर अभिषेक सागर जी
सस्नेहाभिवादन !

मज़हब के नाम पर हैवान बने लोगों को अच्छी फटकार लगाई है …
मज़हब के नाम पर घर लूट खाए हो
सोचो तो जरा सोचो तुम क्या ‘मुहम्मद’ बन पाए हो?
उसके ही नाम पर लूट मचाए हो
इंसान हो … इंसान तुम नहीं बन पाए हो?


अच्छी रचना है , बधाई !
लेकिन बहुत समय हो गया , अब नई पोस्ट कब लगा रहे हैं ?

बसंत ॠतु की हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं !

- राजेन्द्र स्वर्णकार

Rachana said...

sunder prastuti .
aanand aaya padh kr
badhai
rachana

Rachana said...

नफरत है तेरे अन्दर नफरत फैलाएं हो

मज़हब के नाम पर घर लूट खांए हो

सोचो तो जरा सोचो तुम

क्या ‘मुहम्मद’ बन पाएं हो?

उसके ही नाम पर लूट मचाए हो

इन्सान हो इंसान तुम नहीं बन पाए हो?

bahut khoob likha hai
rachana

Unknown said...

सुन्दर शब्द रचना

रचना सागर said...

बहुत बहुत धन्यवाद

रचना सागर said...

बहुत बहुत धन्यवाद

रचना सागर said...

बहुत बहुत धन्यवाद

रचना सागर said...

धन्यवाद

रचना सागर said...

Thank you so much........😊

रचना सागर said...

बहुत बहुत धन्यवाद

रचना सागर said...

धन्यवाद

रचना सागर said...

बहुत बहुत धन्यवाद

रचना सागर said...

Thank you so much

रचना सागर said...

बहुत बहुत धन्यवाद