जान पाई खुद को [कविता]: रचना सागर



रचनाकार परिचय:-

रचना सागर को आरंभ से ही साहित्य मे रूचि थी। आप अंतर्जाल पर विशेष रूप से बाल साहित्य सृजन में सक्रिय हैं।

जान पाई खुद को [कविता]: रचना सागर 

जुड़ी मैं तुझसे तो जान पाई खुद को
बेल बूटे से वृक्ष बनने का साहस दिया खुद को
जुड़ी मैं तुझसे तो चुप्पी के भी मुस्कान आई
जिंदगी की रुकावटों में भी पहचान पाई
जुड़ी मैं तुझसे तो जान पाई खुद को मैं

फागुन





फागुन 

इस फागुफागुन में

दिल दर्द के गुलाल से भर गया

जब भाई के हाथों भाई  कत्लेआम हो गया


जिगर में एक टीस सी उठ गई

जब राम और मुहम्मद के नाम पे

गलियां  बंट गई


अजान और घंटी में फासला तो सदियों से चलती आई

पर आज शारदा ने सलमा से क्यूँ नजरें निरस्त कर गई


इस रंगों के त्योहार में बेरंग दिखे जमाना

गले मिलने की बजाए पीठ दिखाये घराना ...


ये क्या और क्यूं हो गया

जरा कोई तो बताना ...




मेरी नज़र से देखो...


मेरी नज़र से देखो...


गर सहज़ लगती है

स्त्री की जिंदगी तो

मेरी नजर से देखो

सब कुछ होते हुए भी

मोहताज है

दिनभर काम करते हुए भी

बेकार है

अपना सब कुछ देकर भी

निकम्मी और लाचार है

कहते है बराबर का सम्मान है

पर घड़ी-घड़ी नज़रों की शिकार है

कौन कहता है समय बदल गया है

आप ये बताओ ...दहेज देने का

 चलन खत्म हो गया है

सब नज़रों का भ्रम है

क्योंकि आज भी बाहर के साथ

 घर देखना उनका ही कर्तव्य है . . . . 2

हिमाचल की वादिया




हिमाचल की वादिया

अनगिनत चीज़े सीखी मैंने यहां

पाया अपनी उम्मीद से बढ़कर यहां


खट्टी मीठी यादों का बसेरा है दिल में

कई सारे रिश्तों को संजोया है दिल में


खेला कूदा किया मस्ती हजार

हर दिन मनाया जैसे नया त्यौहार


सरसरी हवाएं वो आँधी-तूफान

ये ऊँची वादियां ये गगन चुम्बी पहाड़


और इन गगन चुम्बी पहाड़ियों पर

झिलमिलाती -सी बत्तियां


आशा जगाती, जुनून भर जाती

अद्भुत, अविस्मरणीय, याद दे जाती


थोड़ी सी मुश्किल मुझे ये राह होगी

तेरी जो आदत, मुझे वो छोड़नी होगी ।




हम और हिंदी




हम और हिंदी 

हिन्द और हिंदी का सम्मान करें हम

भारत की माटी हिंदी से प्यार करें हम

हिंदी का पूर्ण विकास हो 

 हिंदी कभी न उदास हो

संस्कृत की बेटी कहलाए हिंदी

मगध अवधी के संग हैं हिंदी

उर्दू अंग्रेजी है सखिया इसकी 

साहित्य में भी नाम बनाए हिंदी

डोर है हिंदी पतंगा है हम 

गुरू है हिंदी शिष्या है हम

सोच में हिंदी स्वप्न में हिंदी

परचम लहराए हिंदी का हम 

लेख में हिंदी सुलेख में हिंदी

राष्ट्र का है परिचय हिंदी

वंदनीय है पूजनीय है

संस्कार की जननी हिंदी

हिंदी से उत्थान हमारा

हिंदी को प्रणाम हमारा ... -2

हिंदी दिवस की शुभकामनाएं🙏

प्रिय शिक्षक [कविता]- रचना सागर







प्रिय शिक्षक [कविता]- रचना सागर


विद्या का सार बताया
पशु और मनुष्य का फर्क समझाया
असभ्य और सभ्यता का मान बताया
आत्मसम्मान और घमंड का तर्क दिया
मन में, घर में, विद्यालय में,
समाज में और पूरे विश्व से
अज्ञानता का अंधकार मिटा
ज्ञान का दीप जलाया
प्रिय शिक्षक ,
आपको करूँ कर जोड़ प्रणाम
आपका बहुत बहुत आभार
जो जीवन का कर दिया उद्धार ..🙏🙏


ग्लानि [यात्रा संस्मरण]- रचना सागर


बात कुछ वर्षों पहले की है , जब जन-जीवन सामान्य चल रहा था। उस समय सभी अपनी अपनी दिनचर्या में व्यस्त और मस्त थे । आज लोगों का विश्वास अच्छाई और भलाई पर से उठता सा जा रहा है। मेरी यह यात्रा वृतांत आज के जमाने में भी छिपी अच्छाई और इंसानियत से है।
यह वाक्या कुछ उस समय का है जब बस सड़को पर दौड़ लगाती थी और बस की दो सीटो पर चार- पांच यात्री यात्रा करते नजर आते थे। मुझे मेरी बच्चों के साथ अचानक ही घर जाने का कार्यक्रम बन गया। ट्रेन की टिकट तो हमने तत्काल बुक करा ली पर बस की टिकट की कुछ व्यवस्था नहीं हो पाई। दूसरा इत्तेफाक यह हुआ कि यह यात्रा हमें अकेले करनी थी मतलब पतिदेव इस यात्रा में शामिल ना हो पाए। फिर क्या था एक परिचित सज्जन (जो हमारे जाने वाले थे) उन्हें हमें ट्रेन तक चढ़ाने की जिम्मेदारी दी गई यह यात्रा हमें डलहौजी से पठानकोट तक बस में करनी थी,जहां वैसे भी गिनी चुनी बसे ही चलती है। सामान के नाम पर मेरे साथ एक बड़ा सा ट्रॉली बैग और एक पर्स था। चूँकि बस यात्रा के दौरान हमारी टिकट कंफर्म नहीं हो पाई थी तो जैसे तैसे हमें बस तो मिल गई पर बस में सीटें पहले से बुक होने के कारण हमारे सीट की व्यवस्था नहीं हो पाई । जैसे -तैसे ,लपकते- लटकते हम बस में यात्रा कर ही रहे थे कि अचानक उस सज्जन पुरुष (जो हमें ट्रेन तक छोड़ने वाले थे) हमें एक सीट की ओर इशारा करते हुए कहा यहां ,"आप बच्चों के साथ बैठ जाओ। " मैंने जैसे-तैसे उस सीट पर बच्चों के साथ बैठते ...इशारा किया कि आप कहां बैठेंगे उन्होंने मेरी ट्रॉली बैग की ओर इशारा करते हुए कहा ... मैं इस पर बैठ जाऊंगा। मैंने भी सहमति से सिर हिला दिया। चूंकि डलहौजी से पठानकोट का सफर करीब तीन से चार घंटे का होता है और रास्ते भी बहुत अच्छी हालत में नहीं है, टॉली बैग मेरा बड़ा था रास्ता लम्बा ,.... ये सोच कर मै उनको बैग पर बैठने से मना न कर पाई और इंसानियत दिखाई ।
इस घटना में मोड़ तब आता है जब एक , दूसरा व्यक्ति जिसे मैं जानती भी न थी वो मेरे टॉली बैग पर आकर चुपचाप बैठ जाता है । मैं अपने साथ के सज्जन पुरुष की ओर इशारा करती हूँ.... कि ये क्यूं मेरे बैग पर बैठ रहा है , उन्होंने इशारे में कहा जाने दो... बैठने दो।
उनके इतना कहते ही मेरी आवाज़ निकल पड़ी.... भईया ये मेरी ट्रॉली बैग है , आप इस पर से उठ जाओ । वो मुझे अनुसुना कर वैसे ही बैठा रहा .... मै फिर से कहती हूँ .... भइया आप इस ट्रॉली बैग पर से उठ जाओ .... वो फिर भी उसी बैग पर थोड़ा हल्का होकर बैठ जाता है I मै फिर उस सज्जन पुरुष को कहती हूँ ट्रॉली टूट जाएंगी। आप दो व्यक्ति इस पर बैठे हो उसकी ओर से कोई प्रहिक्रिया नही होती है ...... मै वापस अनजान व्यक्ति से कहती हूँ... भइया मुझे आगे का सफर अकेले करना है यह ट्रॉली बैग मेरा टूट जाएगा मैं आगे कैसे इसको लेकर जाऊंगी ( एक लंबे स्वर में मैंने उसे कहा ) आप मेरे ट्रॉली बैग पर से उठ जाओ ,आप कहीं और जाकर बैठो I मेरे ट्रॉली बैग पर बैठ कर उसे तोड़ ही दोगे .......। मेरा इतना कहना था कि वह व्यक्ति ना जाने कहां चला गया मैंने सकून की सांस ली और अपनी यात्रा उस एक ही सीट पर बच्चों के साथ पूरी की I बस से उतरने के पश्चात मैंने बड़ी उत्सुकता से उस सज्जन पुरुष से पूछा वह अजनबी व्यक्ति कौन था ...जो जबरदस्ती मेरे ट्रॉली बैग पर बैठ गया था, मेरा तो ट्रॉली बैग ही टूट जाना था । अच्छा हुआ वह चला गया .... वो कहां चला गया? .... फिर नजर नहीं आया ...।
सज्जन पुरुष ने ठंडी सांस भरते हुए मुझे बताया कि तुम जिस सीट पर बैठी थी ... वह सीट उसी व्यक्ति (अजनबी )की थी | इतना सुनना था कि मेरा मन ग्लानि से भर गया । मैने कहां" तो फिर आपने पहले क्यों नहीं बताया। " उन्होंने कहा "मुझे ऐसे रास्ते में चक्कर बहुत आते है जिस वजह से मैं चुप था I" ये थी एक इंसानियत की मिसाल | उस यात्रा के बाद मेरे मन मे उस व्यक्ति के लिए क्षमा और धन्यवाद का बोध रह गया....... । मै आप या कोई कुछ छोटा भी अच्छा काम करते है तो हमे लाइक और कमेन्ट ,शाबसी , मेडल का इंतजार होता है पर कुछ अनजाने से फरिश्ते मौके पर अपनी अच्छाई दिखाकर ना जाने कहां चले जाते हैं और इस तरह यह वाक्या में दिलो जहन में बस गया... जो मैं आप सभी के साथ सांझा कर रही हूं ताकि आज उम्मीद छोड़ते लोग यह जान सके कि अच्छाई अब भी जिंदा है.... जहां लोगो मे स्वार्थ है वहाँ परमार्थ भी है।

अभिनन्दन [कविता]- रचना सागर

अभिनन्दन [कविता]- रचना सागर


तिरंगे के लिए जो जान हुई कुर्बान
अरे! उनका तो मान रखा करो
तू -तू , मैं - मैं करके
यूँ भारत के टुकड़े न किया करो
पीठ - पीछे नोकता चीनी करके
अपने देश को न बदनाम किया करो
तिरंगे के लिए जो जान हुई कुर्बान ...
अरे ! उनका तो मान रखा करो ।
आज के युवा, पाये है अवसर जो तुमने हजारों लाखों
उनको न ट्वीटर ... पर बर्बाद किया करो
पढ़ो - लिखो, विज्ञान ,कला खेलो में भी नाम बनाओ
भारत को दुनिया में शीर्ष स्थान दिलाओ
माँ -बाप की भाँति देश भी तुम से आस लगाए बैठा है
उठो जागो कि इतिहास बदल डालो
ये देश तुम्हारे अभिनन्दन को थाल सजाएं बैठा है
तिरंगे के लिए जो जान हुई कुर्बान
अरे!उनका तो मान रखा करो ।


आओ इस प्रकृति को हम बचाए [कविता]- रचना सागर

आओ इस प्रकृति को हम बचाए [कविता]- रचना सागर


सूरज का उगना सिखलाए
रोज नई शुरूआत कर जाए
ये विशाल पर्वत
हमें आसमान छूने की राह बताए
ये बृक्ष की तनी भुजाए
हर पल आगे बढ्ने को कह जाए
ये दिवार पर चिपकी छिपकली
समस्या मे स्थिर रहने को सिखाती
ये प्रकृति की छोटी छोटी चिंटियाँ
पूरे समय व्यस्त रहने को कहती
इन पंक्षियो का कोलाहल
हमेशा चहकते रहने का सन्केत दे जाए
अंकुरित बीज को तो देखो
क्षण-क्षण परिवर्तन में मुस्कुराने को कहता
मोर के सुंदर पंखो को तो देखो
मानो जीवन का हर रंग हो समाया
नदियो की धारा कह जाती
पथ जैसा भी हो आगे बढना है
ये समय हमें सिखलाता
ये आज जो है, कल नही मिल पाता
कितनी खुबसूरती से प्रभु ने
ये प्रकृति हमे सदा सीख देने को रची
आओ इस प्रकृति को हम बचाए
आओ इस प्रकृति को हम बचाए


ये जाना [कविता]: रचना सागर

 


ये  जाना 

मेरी किस्मत भी मुझे 

अजब  मुंह चिढ़ाती है 

पास दिखती- सी मंजिल को

ओझल-सी कर जाती है 

मैंने  सुना है 

लोगों को

 अक्सर, ये  कहते 

 हर कामयाब पुरुष के

 पीछे 

औरत का साथ होता है

पर 

मैंने ये  जाना (अब तक)

 हर कामयाब औरतों के 

पीछे कोई पुरुष छिपा होता है

 बहुत कम होते है वो लोग

 जो समर्पण मे सच्चा विश्वास रखते हैं

 नहीं तो

 हर कोई यहां फायदा उठाने को बैठा है

 आईना हर घर में है फिर भी 

खुद से नजर चुराए बैठा हैं

मेरी किस्मत भी मुझे 

अजब  मुंह चिढ़ाती है 

पास दिखती- सी मंजिल को

ओझल-सी कर जाती है 


संभाल लेना हमे [कविता]: रचना सागर


आज का ये समय जहाँ एक तरफ तो कुछ भी संभव है तो वही आज के हालात मे दवाईयाँ भी बेअसर है ऐसे में बस जरूरत है हमे सच्चे दिल से प्रार्थना करने की दुआ करने की ...... इसी भावना से जुड़ी मेरी ये कविता ...... जिसका शीर्षक है . . . . . . .....संभाल लेना हमे

                                           संभाल लेना हमे  [कविता]: रचना सागर 



ए खुदा हम तेरे बंदे है
तू ही हमें जाने है
और जीने का सलीका नहीं आता हमें
सलीका सीखा दे जीने का हमें
ए खुदा झुक कर हमें जीना नहीं आता
और जो तन जाए जमाना रूठ जाता है
चुप रहना मेरी फितरत नहीं
और जो बोला नाम लड़ाकू रख दिया
ए खुदा हमने संस्कार बांटे है
संस्कार ही बटोरे है
और जरा हँस क्या लिया
वो तो संस्कार पर ही ऊंगली
ए खुदा हम तेरे बंदे है…….
ए खुदा छोड़ दिया हमने सुनने सुनाने
का सिलसिला
और जो सुनने बैठे तो सुन न पाएँगे
ए खुदा हम तो दुआ और सलाम चलाते है
और प्रणाम को नमस्कार और नमस्ते करते है
वो तो इसको भी हाय-हाय बना कर छोडा है
ए खुदा हम तेरे बंदे है….
ए खुदा चमचों को चमचा ही रहने दे
और जो मजा खाने में ऊगलियाँ देती है
वो चमचों मे कहां, वो चमचों मे कहा..
ए खुदा हम तो चोटियों से भी
तहज़ीब सीख जाते है
और वो तो तहजीब पे तोहमत लगा जाते है
ए खुदा हम तेरे बंदे है….
ए खुदा हम तो तमीज़ की कमीज़
बनाकर दिन रात पहना करते है
और वो तो बस बदतमीजी का चोला
पहना गए हमें
ए खुदा हमने हाई एजुकेशन नही पाया
बस माँ – बाप से कुछ सीखा है
आज तो बस बच्चों में तू बसता है
और उन्ही को मेरा सज़दा है
उन्ही को मेरा सज़दा है...
ए खुदा आखिर मे बस ये दुआ करती हूँ 
रखना ईमान व असमत के साथ हमें
परवाह करती हूँ सबकी
बस संभाले रखना हमे
ए खुदा हम तेरे बंदे है......



राह दिखा दे [कविता]: रचना सागर



 


आज के इस भयावह समय मे इंसान कुछ भी कहने का लिया शब्दहीन हो गया है.....

राह दिखा दे [कविता]: रचना सागर 



ये भी सहूँ वो भी सहूँ
कोई तो दर्द की दवा बता दे
सहने का सिलसिला थाम दे
दिखती है इक रौशनी
उस रौशनी की राह दिखा दे
जिंदा है इंसान अब भी
जिंदा रहने का एहसास करा दे
झूठ के बादल को हटा के
सच का एक सूरज तू उगा दे



इंतजार [कविता]: रचना सागर


 


जब कभी भी हमारे माता पिता को हमारी आवश्यकता हो तो उस समय हमें उनके लिए जरूर आगे आकर उनका दामन थामना चाहिए । वे हमारी नींव हैं उनके बिना हमारा क्या अस्तित्व ... इसी भावना से जुड़ी मेरी ये कविता ...... जिसका शीर्षक है . . . . . . इंतजार

इंतजार [कविता]: रचना सागर 



यूँ तो आपको मैं इक पल भी
भूली न थी
पर कभी -कभी आपके पास
आपकी बाँहो में सिमटने
 का दिल करता है
कुछ कहने कुछ सुनने को 
जी करता है    
जो साथ होते  है वो 
इस विरह की आग को क्या जाने 
पूछो उससे जो साथ रहकर
जुदा होते है
पूछो हम जैसों से जो
 फर्ज के नाम पर बार बार
जुदा होते है

सब्र का फल मीठा होता है 
ये सोच कर खुद को तसल्ली देते हैं
कभी भोगोये होगे हमारे माता पिता अपने कपड़े को
हमारे तन को सुखा रखने के लिए
कभी स्वयं को धूप मे रख
हमे छाया दी होगी
उनको आज जब हमारी जरूरत है
तो दूँगी कदम पर साथ उनका
फिर चाहे गुजर जाये पूरी जिन्दगी
इंतजार मे ....
मिलन की आस में...



एक माँ की सच्चाई ...[बाल कविता]: रचना सागर





माँ  एक ऐसा शब्द जो अपने  आप में सम्पूर्ण  है । पर जाने अनजाने हम उसकी गरिमा को ठेस पहुंचा देते हैं । उसका दिल दुखा देते हैं । पर फिर भी वो अपने बच्चों के लिए अच्छा ही चाहती है। ऐसा सिर्फ एक माँ ही करती है माँ .."एक माँ की सच्चाई ... " 

एक माँ की सच्चाई ...[बाल कविता]: रचना सागर 


मैंने देखा है 
माँ को प्‍यार से मुझे सहलाते हुए
दुनिया से मुझ को छुपाते हुए
उदास होकर भी 
मेरे लिए मुस्कुराते हुए
मैंने देखा है
माँ को स्वयं पर गुस्सा करते हुए
अनकही सी 
आँखों से सब कुछ कहते हुए
न चाहकर भी डांट लगाते हुए
दुनिया के पहलू समझाते हुए
मैंने देखा है
माँ को खुद का श्रृंगार करते हुए
मेरी खुशी में खुश
मेरे गम में आँसू बहाते हुए
मैं समझ न पाई ... .
न पहचान पाई :
उस माँ की कहानी 
 माँ की जुबानी
जब आज मैं  स्वयं माँ  बनी
समझ पाई जान पाई 
माँ के पहलू को पर..
मैं आज भी जुबा से बयान
न कर पाई ... .
एक माँ की सच्चाई...


झलक [कुछ पंक्तियाँ]:रचना सागर

औरत मे अनगिनत भावनाए समाहित होती है उन्ही भावनाओ की एक छोटी सी झलक.....आज का इस महिला दिवस का उपलक्ष मे ....

झलक [कुछ पंक्तियाँ]:रचना सागर 



कोई तो मुझ में बात रही होगी,
तभी तो तेरी महफिल मे मेरी चर्चा हुई होगी। 

रास्तो की थपकियों से इंसान चलने का हुनर सीखता है,
वरना कहाँ उसे सही रास्ते का पता होता है....
 

न दिल होता न दर्द होता
न ये दिल और दर्द का
रिश्ता हम से होता
न महफिल जमती
न पैमाना चढता
न ही आँखो से
अश्क छलकता
ये दिल ही तो है ...
.

इश्क इश्क सबने किया
इश्क न जाने कोय
इश्क की इबादत जो करे
इश्क उसी का होय। 




आजादी का पैमाना [कविता]: रचना सागर

 


जब बात एक औरत की पाबंदी और उसे आजादी देने की आती है तो घूमना, खाना ,उठना, बैठना, पढ़ना ये सब उसकी आजादी के पैमाने गिनाए जाते हैं । इसी संदर्भ में पेश है मेरी नई कविता ...

आजादी का पैमाना [कविता]: रचना सागर 



मैं चिड़िया होकर भी
पंख फड़फड़ाने से
कतराती रही
यहां तो अंडे भी चोच
मार जाते रहे
जो चुपचाप सुनती रहूं
संस्कारी कहीं जाऊँ
जो दिल का कह दूं
Attitude वाली नज़र आने लगूँ
बात तब भी वही थी
बात अब भी वही है
बस फर्क यह आ गया
दिन को दिन और रात को रात
कह दिया
खामोश थी
पर जुबान तो तब भी थी
सही - गलत पर चुप रही
पर पहचान तो तब भी थी
मैं चिड़िया होकर भी
पंख फड़फड़ाने से
कतराती रही
यहां तो अंडे भी चोच
मार जाते रहे....



एक खामोशी भरा रिश्ता [कविता]: रचना सागर

 




आज के इस समय में हर इंसान से हमारा कोई ना कोई रिश्ता जुड़  ही जाता है कुछ  मीठे अनुभव दे जाते हैं तो कुछ कड़वी  सीख...इसी संदर्भ में पेश है मेरी नई कविता ...

एक खामोशी भरा रिश्ता [कविता]: रचना सागर 



रिश्ता है हमारे  बीच दर्द का
जहाँ फुर्सत नहीं एक पल गँवाने का
मैंने हर पल तुम्हें जिया है
जिंदा रखा है अपने एहसासों में
अपनी हर सांसों में
तू खामोश रहता था
मुझसे दूर रहता था
मैं महसूस करती थी
मेरी तन्हाई को, तेरी सादगी को
तू जाने को चला गया
एक रिश्ता जोड़ गया
दर्द मैंने दिए थे तुझे
उस दर्द को मेरे लिए छोड़ गया
हर दर्द को पी जाऊँगी
हर ज़ख्म को सह जाऊंगी
तू खुश रहे हमेशा
यही कामना कर जाऊँगीी



चंद्रशेखर बनूंगा मैं [बाल कविता]: रचना सागर



मेरे बेटे की मांग पर यह कविता उस वीर के नाम जिन्होंने आजादी की लड़ाई में अपना महत्वपूर्ण योगदान देते हुए अंग्रेजों में एक ख़ौफ़ पैदा कर आजादी की लड़ाई में एक जान फूंक दी। .... पेश है मेरी नई कविता "चंद्रशेखर बनूंगा मैं " 

चंद्रशेखर बनूंगा मैं [बाल कविता]: रचना सागर 


माँ मुझ को गुलेल दिला दो
चंद्रशेखर बनूंगा मैं।

सत्य राह पर चलूंगा मैं
सबसे आगे रहूँगा मैं।

हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई
यह अपने है भाई- भाई ।
माँ मुझ को गुलेल दिला दो
चंद्रशेखर बनूंगा मैं।

भगत सिंह ,सुखदेव, राजगुरु
यह थे कल के आजाद सिपाही।

आज का सैनिक बनूंगा मैं
भारत माँ की सेवा करुंगा मैं ।

माँ मुझ को गुलेल दिला दो
चंद्रशेखर बनूंगा मैं।


मेरे सपनों का भारत [बाल कविता]: रचना सागर


आज हमारे लिए बड़े सौभाग्य की बात है की हमें हर साल 26 जनवरी को गणतन्त्र  दिवस मनाने का मौका मिलता है| हर साल की तरह इस साल भी सभी को इस दिवस की बहुत बहुत शुभकामनाए व इस दिवस पर पेश है मेरे नई बाल कविता "मेरे सपनों का भारत

  

मेरे सपनों का भारत [बाल कविता]: रचना सागर 


मेरे भारत में ना कोई भुखमरी से मरे
हर जवान काम मेहनत से करें

ना किसी हिंदुस्तानी का मन बिके
यहाँ सभी अच्छे गुण ही सीखेँ

यहां पर ना हो भ्रष्टाचार का नामोनिशान
प्रगति का पथ सीखें.... यहां पर हर इंसान

हर सैनिक करें दुश्मनों को लहूलुहानन
न करें अपनी जान कुर्बान

गरीबी व अशिक्षा से मिलें इसे छुटकारा
चमके हर बालक बन एक सितारा

यहाँ कभी ना बैठे कोई युवक बेकार
यहाँ पर हो नौकरियों की भरमार

मेरा भारत बन जाए पृथ्वी का गहना
इसकी उन्नति का क्या कहना

बढ़ती रहेंगी इस तिरंगे की शान
सारे जग से प्यारा मेरा हिंदुस्तान


पर्यावरण बचाती मैना [बाल कविता]: रचना सागर





हमारे घर आंगन मे...हमारे रोजमर्रा के जीवन में पर्यावरण को बचाने मे सबसे बड़ा  योगदान इन  चिड़ियों का है ..इनके बिना हमारा जीवन परिवेश अधूरा है ..... पेश है मेरी नई कविता "मैंना " 

पर्यावरण बचाती मैना [बाल कविता]: रचना सागर 


रोज सवेरे आती मैना, 
मेरे मन को भाती मैना, 
बचा खुचा भोजन खाकर, 
पर्यावरण बचाती मैना।

देखो तो कितनी सुंदर है, 
भूरा पीला अनमोल रंग है, 
शान से गर्दन ऊपर करती, 
फिर मटक- मटक के चलती मैना ।

खुशी का राग सुनाती मैना, 
रोज सवेरे आती मैना,
मेरे मन को भाती मैना ।

जिस घर आंगन बसती मैना, 
प्यार की खुशबू फैलाती मैना ।
डाल डाल फिरती है मैना, 
सबके चेहरे पर मुस्कान भरती मैना ।

रोज सवेरे आती मैना, 
मेरे मन को भाती मैना ।
वातावरण खुशहाल बनाएं हम भी, 
मैना जैसे बन, सब के मन को भाए हम भी ।
पर्यावरण बचाएं हम भी ।